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October 26, 2025

"High Court ने कहा – Cash Loan पर Check Bounce Case नहीं चलेगा!"

 


यह निर्णय हमारे देश की न्याय व्यवस्था और आर्थिक अनुशासन दोनों के लिए एक अहम संदेश लेकर आया है।
केरल हाईकोर्ट ने P.C. Hari बनाम Shine Varghese (2025) मामले में साफ कहा — 


₹20,000 से अधिक की नकद लेनदेन को अदालतें कानूनी नहीं ठहराएंगी, जब तक कि उसका उचित कारण साबित न किया जाए।  



मामला साधारण था — शिकायतकर्ता ने कहा कि उसने ₹9 लाख नकद उधार दिए, जिसके बदले में आरोपी ने चेक दिया जो बाउंस हो गया। ट्रायल कोर्ट और सेशन कोर्ट दोनों ने आरोपी को दोषी ठहराया, लेकिन हाईकोर्ट ने फैसला पलट दिया।


न्यायमूर्ति P.V. Kunhikrishnan ने कहा कि आयकर अधिनियम की धारा 269SS के तहत ₹20,000 से अधिक नकद उधार या जमा लेना-देना मना है। इस कानून का उद्देश्य है कि देश में काले धन और नकद लेनदेन को रोका जा सके।
अगर फिर भी कोई व्यक्ति इतनी बड़ी राशि नकद में लेता या देता है, तो वह खुद कानून तोड़ रहा है। ऐसे में वह अदालत से यह नहीं कह सकता कि “मेरा पैसा लौटाओ” क्योंकि वह पैसा कानूनी तरीके से दिया ही नहीं गया था।


जज ने यह भी कहा कि जब देश डिजिटल इंडिया की दिशा में बढ़ रहा है, तो अदालतें उन नकद सौदों को वैध नहीं मान सकतीं जो कानून के खिलाफ हैं। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा


  अगर कोई व्यक्ति ₹20,000 से अधिक नकद देता है और फिर उस पर चेक लेता है, तो वह खुद जिम्मेदार है कि उसे पैसा वापस न मिले।  


इस फैसले का असर बड़ा है। अब से अगर किसी ने ₹20,000 से अधिक नकद उधार दिया और बाद में चेक बाउंस हो गया, तो धारा 138 N.I. Act के तहत केस नहीं चलेगा। जब तक यह साबित न किया जाए कि नकद लेनदेन का कोई उचित कारण था (जैसे किसी आपात स्थिति में)।


संक्षेप में — यह फैसला बताता है कि कानून केवल अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए समान है। अगर सरकार डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा दे रही है, तो न्यायालय भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। 


October 22, 2025

“सत्य की खोज में साक्ष्य की भूमिका — एक विधिक विश्लेषण”

  



भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Indian Evidence Act) के अंतर्गत साक्ष्य (Evidence) के कई प्रकार बताए गए हैं — हर प्रकार की अपनी कानूनी प्रकृति और उपयोगिता होती है। नीचे उनका क्रमवार विवरण दिया जा रहा है, ताकि  किसी भी मुकदमे में उचित साक्ष्य की पहचान कर सकें 


⚖️ मुख्य प्रकार के साक्ष्य (Types of Evidence under Indian Law)




⚖️ 1. Direct Evidence (प्रत्यक्ष साक्ष्य)


यह वह साक्ष्य होता है जो किसी तथ्य को सीधे सिद्ध करता है, किसी अनुमान की आवश्यकता नहीं होती।

उदाहरण:
– प्रत्यक्षदर्शी गवाह (Eye witness)
– CCTV में अपराध की रिकॉर्डिंग

कानूनी स्थिति:
ऐसे साक्ष्य सबसे मजबूत माने जाते हैं।



⚖️ 2. Circumstantial Evidence (परिस्थितिजन्य साक्ष्य)


 जब प्रत्यक्ष साक्ष्य न हो, तो परिस्थितियों की श्रृंखला से अपराध सिद्ध किया जाता है।

उदाहरण: खून लगे कपड़े, भागने का प्रयास, मृतक के साथ अंतिम बार देखा जाना।

सिद्धांत: परिस्थितियाँ इतनी मजबूत हों कि किसी अन्य निष्कर्ष की गुंजाइश न रहे।



⚖️ 3. Documentary Evidence (दस्तावेजी साक्ष्य)

 

कोई भी लिखित, मुद्रित, या इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ जो किसी तथ्य को सिद्ध करे।

प्रावधान:

  • Section 61 to 90, Evidence Act
    उदाहरण: अनुबंध (Contract), वसीयत (Will), रसीदें, बैंक स्टेटमेंट, इलेक्ट्रॉनिक मेल।


⚖️ 4. Oral Evidence (मौखिक साक्ष्य)

 

ऐसा साक्ष्य जो गवाह अपने ज्ञान या अनुभव के आधार पर अदालत के समक्ष मौखिक रूप से प्रस्तुत करता है।

प्रावधान:

  • Section 59–60, Evidence Act
    नियम: मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिए — सुनी-सुनाई बात (Hearsay) आमतौर पर स्वीकार्य नहीं होती।


⚖️ 5. Primary Evidence (मूल साक्ष्य)

मूल दस्तावेज़ या वस्तु जो सीधे अदालत में प्रस्तुत की जाती है।

उदाहरण: अनुबंध का मूल कागज, असली रसीद, असली फोटो।

प्रावधान: Section 62, Evidence Act.



⚖️ 6. Secondary Evidence (द्वितीयक साक्ष्य)

जब मूल दस्तावेज़ उपलब्ध न हो, तब उसकी प्रति, फोटोकॉपी या प्रमाणित नकल पेश की जाती है।

प्रावधान: Section 63, Evidence Act.



⚖️ 7. Corroborative Evidence (पुष्टिकारक साक्ष्य)

 ऐसा साक्ष्य जो किसी अन्य साक्ष्य की विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

प्रावधान: Section 157, Evidence Act.



⚖️ 8. Hearsay Evidence (सुनी-सुनाई साक्ष्य)

 जो गवाह स्वयं नहीं जानता बल्कि किसी और से सुना हो।
कानून: सामान्यतः यह अस्वीकार्य (inadmissible) होता है, क्योंकि यह अविश्वसनीय माना जाता है।



⚖️ 9. Electronic Evidence (इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य)

 कोई भी सूचना जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्राप्त हुई हो।

प्रावधान: Section 65A और 65B, Evidence Act.

उदाहरण: ईमेल, व्हाट्सऐप चैट, सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल दस्तावेज़।



⚖️ 10. Expert Evidence (विशेषज्ञ साक्ष्य)

 जब किसी विशेष ज्ञान या तकनीकी क्षेत्र से संबंधित तथ्य सिद्ध करने हों।

प्रावधान: Section 45, Evidence Act.

उदाहरण:
– डॉक्टर का पोस्टमार्टम रिपोर्ट
– हैंडराइटिंग या फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की राय।



⚖️ 11. Dying Declaration (मृत्युकालीन घोषणा)

 

जब कोई व्यक्ति मृत्यु के पहले किसी अपराध के संबंध में बयान देता है।

प्रावधान: Section 32(1), Evidence Act.

कानूनी स्थिति: यदि विश्वास योग्य हो तो यह अकेले ही अभियुक्त को दोष सिद्ध कर सकता है।



October 20, 2025

“चेक बाउंस पर 20% राशि देने का कानूनी प्रावधान”

 


⚖️  “चेक बाउंस पर 20% राशि देने का कानूनी प्रावधान” 


चेक बाउंस के मामलों में कानूनी प्रावधान, जिसमें अदालत अभियुक्त से मुकदमे की शुरुआत में ही चेक राशि का 20% पीड़ित व्यक्ति को देने का आदेश दे सकती है।


⚖️ Legal Background

कई बार लोग किसी लेन-देन में नकद रकम न देकर चेक दे देते हैं।
पर जब बैंक में वह चेक जमा होता है, तो कई बार वह बाउंस हो जाता है — यानी खाते में पर्याप्त रकम नहीं होती, सिग्नेचर गलत होते हैं, या खाता बंद होता है।

ऐसे में यह act of dishonour विश्वासघात और आर्थिक धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।
इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 लागू होती है।
यह धारा कहती है कि अगर किसी का चेक बाउंस हो जाता है, तो वह एक अपराध (offence) है, और पीड़ित व्यक्ति न्यायालय में परिवाद (complaint) दाखिल कर सकता है।


⚖️ नया प्रावधान – धारा 143(ए)

चेक बाउंस मामलों की बढ़ती संख्या और धीमी प्रक्रिया को देखते हुए संसद ने Section 143(A) जोड़ा।
इसके तहत, जब आरोपी व्यक्ति अदालत में पेश होता है,
तो न्यायालय उसे आदेश दे सकता है कि वह चेक राशि का 20% पीड़ित पक्ष को अंतरिम प्रतिकर (interim compensation) के रूप में तुरंत दे।


⚖️ उदाहरण से समझिए

मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने किसी को ₹1,00,000 का चेक दिया।
चेक बाउंस हो गया।
पीड़ित ने कोर्ट में केस दायर किया।
जब आरोपी कोर्ट में उपस्थित होता है, तब कोर्ट कह सकती है कि —
"तुम्हें इस ₹1,00,000 की 20% राशि यानी ₹20,000 अभी पीड़ित को देनी होगी।"


⚖️ अगर आरोपी दोषमुक्त हो जाए

अगर केस में आरोपी निर्दोष साबित होता है,
तो अदालत यह 20% राशि वापस कराने का आदेश देती है।

लेकिन, अगर आरोपी दोषी पाया जाता है,
तो उसे बाकी की राशि, ब्याज और न्यायालय शुल्क तक भरना पड़ता है।


⚖️ अपील की स्थिति

अगर आरोपी सत्र न्यायालय में अपील करता है,
तो अपील पर सुनवाई तब तक नहीं होती जब तक वह कुल राशि का 20% कोर्ट के आदेश अनुसार नहीं भर देता।


⚖️ न्यायिक मंतव्य (Judicial Intention)

इस प्रावधान का मकसद साफ है —
“जो व्यक्ति चेक देता है, उसने किसी वैध लेन-देन के तहत ही दिया होगा।”
क्योंकि कोई भी व्यक्ति यूं ही किसी को चेक नहीं देता।
इसलिए कोर्ट मानती है कि पीड़ित पक्ष को प्रारंभिक राहत (early relief) मिलनी चाहिए।


यह कानून अब यह सुनिश्चित करता है कि
जो व्यक्ति चेक के भरोसे किसी को भुगतान करता है,
वह उस भरोसे को तोड़ने की कीमत पहले ही अदा करे
कानून कहता है —
"भरोसे से दिया गया चेक, जिम्मेदारी से निभाया जाए।"



October 17, 2025

बाल संरक्षण की ढाल "जब त्याग बन जाता है दंडनीय अपराध"

 



जब माता-पिता या अभिभावक, जिन्हें बच्चों की रक्षा करनी चाहिए, उसे असहाय छोड़ देते हैं — तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 93 इसी अमानवीय कृत्य को दंडित करती है।


⚖️ कानूनी प्रावधान
 


यदि कोई पिता, माता या संरक्षक, जो 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की देखभाल करता है, उस बच्चे को किसी स्थान पर जानबूझकर छोड़ देता है या त्याग देता है, इस इरादे से कि वह बच्चा सदा के लिए छोड़ दिया जाए,
तो ऐसा व्यक्ति सात वर्ष तक की कैद, जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।


यह कानून सिर्फ़ परित्याग को अपराध नहीं मानता, बल्कि इसके पीछे के इरादे (intention) को भी देखता है।
अगर किसी ने बच्चे को छोड़ने का ऐसा कार्य इस सोच के साथ किया कि वह दोबारा कभी लौटकर न आए — तो यह “पूरी तरह से परित्याग” (wholly abandoning) कहलाता है।


⚖️ स्पष्टीकरण


अगर इस परित्याग के कारण बच्चे की मृत्यु हो जाती है, तो आरोपी पर केवल यह धारा नहीं लगेगी, बल्कि उसे हत्या (Murder) या आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) के लिए भी मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।


⚖️ Conclusion


कानून यह स्पष्ट संदेश देता है —
माता-पिता होना एक जिम्मेदारी है, अधिकार नहीं।
बच्चे को त्यागना, उसे जीवन के खतरे में डालना है — और यह अपराध है।


धारा 93 हमें याद दिलाती है कि समाज की संवेदनशीलता की शुरुआत, सबसे पहले अपने बच्चों की सुरक्षा से होती है।


October 15, 2025

गर्भ में पल रहे जीवन की कानूनी सुरक्षा

 


   

भारतीय न्याय संहिता की धारा 92 उस स्थिति पर लागू होती है जब किसी व्यक्ति के कृत्य से गर्भ में पल रहे “जीवित भ्रूण” (quick unborn child) की मृत्यु हो जाती है। यह धारा बताती है कि भ्रूण का जीवन भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी जन्मे हुए व्यक्ति का।


यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो,  परिस्थितियों में, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु कर देता, तो मानव वध (culpable homicide) कहलाता — और वही कार्य गर्भ में पल रहे भ्रूण की मृत्यु का कारण बनता है, तो ऐसे अपराधी को 10 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।   धारा 92, भारतीय न्याय संहिता 2023 


⚖️ उदाहरण

मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी गर्भवती स्त्री को मारने के उद्देश्य से चोट पहुँचाता है। स्त्री तो जीवित बच जाती है, लेकिन उसके गर्भ में पल रहा बच्चा मर जाता है।
इस स्थिति में वह व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दोषी माना जाएगा, क्योंकि उसके कृत्य से एक जीवन समाप्त हुआ, भले ही वह जन्म से पहले था।

⚖️ कानूनी दृष्टि से महत्व


यह धारा यह संदेश देती है कि कानून भ्रूण के जीवन को भी मानव जीवन का दर्जा देता है।
यह न केवल गर्भवती स्त्री की सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि उस नए जीवन की भी जो अभी जन्म नहीं ले पाया है।


धारा 92 न्याय और नैतिकता दोनों के बीच पुल का काम करती है। यह बताती है कि जीवन की सुरक्षा का अधिकार गर्भ में पलते भ्रूण से शुरू होता है, और उसकी मृत्यु भी कानून की नज़र में गंभीर अपराध है।


October 13, 2025

झूठी खबरों को फैलाने की सज़ा”

 


“ झूठी खबरों को फैलाने की सज़ा ”

  धारा 353, भारतीय न्याय संहिता 2023


आज सोशल मीडिया के माध्यम से फेक न्यूज का प्रसार तेजी से होता है।
कई बार धार्मिक या राजनीतिक मुद्दों पर फैलाई गई गलत जानकारी हिंसा या दंगे तक पहुंच जाती है।

ऐसे में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353  समाज में शांति और एकता बनाए रखने का कानूनी हथियार है।


⚖️ धारा 353 का उद्देश्य

इस धारा का मुख्य उद्देश्य है —
“झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाकर समाज या राज्य की शांति को भंग करने वालों पर नियंत्रण।”
यह प्रावधान उन सभी पर लागू होता है जो किसी भी माध्यम से
मौखिक, लिखित, या इलेक्ट्रॉनिक — गलत सूचना या अफवाह फैलाते हैं।


⚖️ Section 353 (1): सेना और सार्वजनिक शांति पर प्रभाव


यदि कोई व्यक्ति झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाता है जिससे —सेना, नौसेना या वायुसेना के कर्मियों में अनुशासनहीनता या विद्रोह फैल सके,

जनता में डर, अफरातफरी या अपराध की प्रवृत्ति पैदा हो,

या किसी समुदाय को दूसरे के विरुद्ध भड़काया जाए,

तो ऐसे व्यक्ति को तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।


⚖️ Section 353(2): नफरत फैलाने वाले बयान

 

यदि कोई व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा, निवास या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता, घृणा या वैमनस्य पैदा करने के लिए झूठी जानकारी फैलाता है,
तो यह भी अपराध है।
इसके लिए भी तीन वर्ष तक की सज़ा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।


⚖️ Section 353(3): धार्मिक स्थलों पर अपराध

 

यदि यह अपराध किसी पूजा स्थल या धार्मिक सभा में किया गया हो,
तो सज़ा और भी कठोर है —
पाँच वर्ष तक की कैद और जुर्माना दोनों।


⚖️ अपवाद (Exception)


यदि कोई व्यक्ति सच्चे विश्वास और सद्भावना में कोई सूचना देता है,
और उसे झूठा मानने का कोई कारण नहीं था,
तो उसे इस धारा के अंतर्गत दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
अर्थात, सद्भावना से की गई गलती अपराध नहीं है।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है।


October 12, 2025

जबरन विवाह या महिला का अपहरण – धारा 87, भारतीय न्याय संहिता 2023

   
Advocate Rahul Goswami,BNS 2023,

आज भी समाज में ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी या अवैध संबंध के लिए बहकाया या जबरन ले जाया जाता है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 87 ऐसे ही अपराधों को रोकने के लिए बनाई गई है।


⚖️ क्या कहती है धारा 


यदि कोई व्यक्ति किसी महिला का अपहरण या बहकाकर ले जाता है, इस नीयत से कि —


● उसे जबरन विवाह करने पर मजबूर किया जाए,

या

● उसे अवैध संबंध में धकेला जाए,

तो यह गंभीर आपराधिक कृत्य माना जाएगा।



⚖️ 🔹 दंड का प्रावधान


इस अपराध के लिए सज़ा का प्रावधान है —

● अधिकतम दस वर्ष तक की कैद और जुर्माना

● यह दंड केवल अपहरण करने वाले पर ही नहीं,

बल्कि उस व्यक्ति पर भी लागू होता है जो धमकी, दबाव या अधिकार का दुरुपयोग करके महिला को किसी स्थान से जाने के लिए मजबूर करता है, यह जानते हुए कि उसे बाद में जबरन विवाह या अवैध संबंध के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।



⚖️  कानूनी उद्देश्य


● महिलाओं की इच्छा और स्वतंत्रता की रक्षा करना।

● किसी भी महिला को जबरन विवाह या शारीरिक संबंध के लिए बाध्य करना, केवल उसके सम्मान का नहीं बल्कि उसकी संवैधानिक गरिमा का भी उल्लंघन है।




⚖️ समाज के लिए संदेश


● धारा 87 यह याद दिलाती है कि —

विवाह प्रेम या सहमति से हो सकता है, पर दबाव या छल से नहीं। कानून ऐसे हर व्यक्ति को कठोर सज़ा देता है जो महिला की “ना” को नज़रअंदाज़ कर उसे जबरदस्ती अपने हक में करना चाहता है।

September 30, 2025

. “पारिवारिक समझौते को मिलेगी प्राथमिकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला”

 


⚖️ संपत्ति विवादों में पारिवारिक समझौते को प्राथमिकता – इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय


पारिवारिक विवाद अक्सर वर्षों तक अदालतों में चलते रहते हैं, जिससे परिवार की एकता टूटती है और आर्थिक संसाधन भी खर्च हो जाते हैं। ऐसे हालात में पारिवारिक समझौता (Family Settlement) न्याय का एक सरल और व्यावहारिक तरीका माना जाता है। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसी मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सह-पट्टेदारों के बीच वास्तविक और स्वैच्छिक समझौता हुआ है, तो संपत्ति का विभाजन उसी आधार पर होना चाहिए।


⚖️ केस पृष्ठभूमि
  • वाद में पैतृक संपत्ति को लेकर सह-खातेदारों में विवाद था।
  • याचिकाकर्ता ने कहा कि पहले ही मौखिक बंटवारा हो चुका है, लेकिन राजस्व लगान और भूखंडों के सही स्थान को लेकर विवाद बना हुआ है।
  • राजस्व बोर्ड ने कहा कि संपत्ति संयुक्त कब्जे में है, जबकि निचली अदालत ने पारिवारिक समझौते को मान्यता दी।
  • इसी आदेश के खिलाफ रिट याचिका दाखिल की गई।

⚖️ उच्च न्यायालय का अवलोकन


न्यायमूर्ति आलोक माथुर की खंडपीठ ने कहा:

  1. पारिवारिक समझौता वास्तविक और न्यायसंगत होना चाहिए।
  2. यह समझौता स्वेच्छा से होना चाहिए, न कि धोखाधड़ी, दबाव या अनुचित प्रभाव से।
  3. पारिवारिक समझौता मौखिक भी हो सकता है और इसके लिए पंजीकरण आवश्यक नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पक्षकारों में इस समझौते को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो इसे मान्यता देते हुए कुर्रा (राजस्व अभिलेखों में विभाजन) उसी आधार पर तैयार किया जाए।


⚖️ कानूनी आधार
  • उ.प्र. राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 109(5)(छ) में पारिवारिक समझौते को विधिवत मान्यता दी गई है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों में भी कहा गया है कि पारिवारिक व्यवस्था का उद्देश्य परिवार को लंबी मुकदमेबाजी से बचाना और सौहार्द बनाए रखना है।

⚖️ न्यायालय की सोच


अदालत ने कहा कि “परिवार” शब्द को व्यापक अर्थ में समझना होगा। इसमें केवल नजदीकी रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि वे सभी व्यक्ति शामिल हो सकते हैं जिनका कोई दावे का अधिकार बनता है। पारिवारिक समझौते का उद्देश्य भविष्य के विवादों को खत्म करके परिवार को अधिक रचनात्मक कार्यों की ओर अग्रसर करना है।


⚖️ निष्कर्ष


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट संदेश दिया कि पारिवारिक समझौता अदालतों पर बोझ कम करने, न्याय की सरल उपलब्धता और पारिवारिक सौहार्द बनाए रखने का सर्वोत्तम साधन है। इसलिए यदि समझौता निष्पक्ष, स्वैच्छिक और बिना धोखाधड़ी के हुआ है, तो उसे अदालतों द्वारा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


केस शीर्षक

शहादत अली एवं अन्य बनाम राजस्व बोर्ड, उत्तर प्रदेश एवं अन्य



September 28, 2025

“चेक बाउंस केसों में राहत: अब समझौते पर घटा जुर्माना”

 


 चेक बाउंस के मामले देश की अदालतों में सबसे ज़्यादा संख्या में लंबित रहते हैं। ऐसे मामलों को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले दामोदर एस. प्रभु बनाम सैयद बाबालाल केस में कुछ नियम बनाए थे। उन नियमों के मुताबिक, अगर आरोपी और शिकायतकर्ता आपस में समझौता कर लेते हैं तो अलग-अलग स्तर की अदालत में कुछ प्रतिशत जुर्माना देकर मामला खत्म किया जा सकता था।


लेकिन अब हाल ही में, संजाबीज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर केस में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों में बदलाव किया है। वजह साफ है—पिछले कुछ सालों में ब्याज दरें कम हुई हैं और ढेरों चेक बाउंस केस अब भी अटके पड़े हैं। इसलिए कोर्ट ने ज़रूरी समझा कि पुराने नियमों को हल्का किया जाए, ताकि समझौते के रास्ते आसान बनें।

 

⚖️ नए नियम ये कहते हैं:


  1. अगर आरोपी ट्रायल में अपने गवाह पेश करने से पहले चेक की रकम चुका देता है, तो उस पर कोई जुर्माना नहीं लगेगा।
  2. अगर गवाह पेश करने के बाद लेकिन ट्रायल कोर्ट के फैसले से पहले भुगतान करता है, तो चेक की रकम के ऊपर 5% अतिरिक्त राशि देनी होगी।
  3. अगर मामला सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट में है, तो 7.5% अतिरिक्त राशि देनी होगी।
  4. और अगर समझौता सुप्रीम कोर्ट के सामने होता है, तो ये राशि 10% तक होगी।

यानी पहले की तुलना में यह बोझ आधा कर दिया गया है। पहले जहां सुप्रीम कोर्ट में 20% तक जुर्माना देना पड़ता था, अब सिर्फ 10% देना होगा।


कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शिकायतकर्ता चेक राशि से ज्यादा वसूली की मांग करता है, तो मजिस्ट्रेट अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके या तो आरोपी को दोषी मान सकता है, या फिर CrPC की धारा 255 और BNSS की धारा 278 के तहत विकल्पों पर विचार कर सकता है। ज़रूरत पड़ने पर परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का लाभ भी दिया जा सकता है।


⚖️ इस फैसले का प्रभाव


क्योंकि यह चेक बाउंस मामलों को जल्दी सुलझाने का रास्ता खोलता है, और आरोपी को भी राहत देता है। वहीं, शिकायतकर्ता को मूल धनराशि के साथ कुछ अतिरिक्त मुआवज़ा भी मिल जाता है।

 सुप्रीम कोर्ट का मकसद है: कम झंझट, जल्दी न्याय, और दोनों पक्षों के लिए संतुलित समाधान।



September 21, 2025

“संपत्ति विवादों में डबल रजिस्ट्री: जिम्मेदार कौन?” विक्रेता, रजिस्ट्रार और खरीदार के अधिकार

 



⚖️ संपत्ति पर डबल रजिस्ट्री : एक गंभीर कानूनी समस्या


भारत में भूमि व संपत्ति के विवादों में सबसे पेचीदा मामला तब खड़ा होता है जब एक ही ज़मीन की दोहरी रजिस्ट्री (Double Registration) हो जाती है। यानी विक्रेता पहले किसी एक व्यक्ति को ज़मीन बेच चुका है और फिर उसी संपत्ति की दोबारा बिक्री किसी अन्य को कर देता है। यह स्थिति केवल खरीदारों के लिए नहीं बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीर लापरवाही मानी जाती है।


⚖️ रजिस्ट्री दोबारा कैसे हो जाती है?

कानून के अनुसार जब कोई संपत्ति एक बार वैध रूप से रजिस्टर्ड हो जाती है, तो उसी संपत्ति की पुनः रजिस्ट्री होना नहीं चाहिए। इसके बावजूद यह समस्या तीन कारणों से देखने को मिलती है—

  1. धोखाधड़ी (Fraud) : विक्रेता जानबूझकर संपत्ति बार-बार बेचता है।
  2. लिपिकीय त्रुटि (Clerical Error) : रजिस्ट्रार कार्यालय में रिकॉर्ड मिलान सही ढंग से न होने पर।
  3. मिलीभगत : कुछ मामलों में रजिस्ट्रार की लापरवाही या संदेहास्पद भूमिका भी सामने आती है।

⚖️ ज़िम्मेदारी किसकी?
  • रजिस्ट्रार कार्यालय : रजिस्ट्रार का दायित्व है कि पहले से दर्ज रजिस्ट्री का मिलान करके ही नई एंट्री करे। यदि यह नहीं होता तो यह प्रशासनिक लापरवाही है।
  • विक्रेता : जिसने एक ही ज़मीन दो बार बेची, उस पर सीधे तौर पर धोखाधड़ी (Cheating) और छल का आरोप बनता है।

⚖️ कब्ज़ा किसके पास रहेगा?

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि—

  • पहली वैध बिक्री ही प्रभावी मानी जाएगी।
  • दूसरी रजिस्ट्री कानूनन शून्य (Void) हो जाती है।
  • यदि पहला खरीदार कब्ज़े में है तो उसका हक मज़बूत होगा।

⚖️ उपाय और कानूनी प्रावधान
  1. दीवानी वाद (Civil Suit) : पीड़ित पक्ष दूसरी रजिस्ट्री को निरस्त कराने और अपने स्वामित्व की घोषणा (Declaration of Title) के लिए वाद दायर कर सकता है।
  2. फौजदारी कार्यवाही (Criminal Action) : यदि धोखाधड़ी सिद्ध हो तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 319 (धोखाधड़ी) और संबंधित धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।
  3. रजिस्ट्री रद्द करना : न्यायालय के आदेश से दूसरी बिक्री रद्द की जा सकती है।
  4. क्षतिपूर्ति (Recovery Suit) : जिस पक्ष को नुकसान हुआ है वह न्यायालय से हर्जाना (Damages) मांग सकता है।

⚖️ निष्कर्ष


डबल रजिस्ट्री सिर्फ तकनीकी चूक नहीं बल्कि गंभीर कानूनी अपराध है। खरीदार को सतर्क रहना चाहिए कि रजिस्ट्री से पहले भूमि का रिकॉर्ड, एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट और म्यूटेशन एंट्री सही ढंग से जांचे। वहीं, सरकार और रजिस्ट्रार की भी जिम्मेदारी है कि इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।