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पुलिस के सामने दिया बयान क्यों नहीं मानती अदालत?

 

⚖️ आपराधिक न्याय-प्रणाली में स्वैच्छिक कथनों की महत्ता


भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी के स्वैच्छिक कथन (Voluntary Statement) की सत्यता एवं प्रमाणिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी संवेदनशील विषय को व्यवस्थित करने हेतु Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), 2023 की धाराएँ 182 से 184 विस्तृत दिशा-निर्देश प्रदान करती हैं। यह प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी व्यक्ति से लिया गया कथन “उत्प्रेरण, प्रलोभन या दबाव” से मुक्त हो तथा न्यायिक प्रक्रिया में विधिसम्मत रूप से उपयोग योग्य रहे।



⚖️ धारा 182 : कथन के लिए ‘स्वतंत्र इच्छा’ का संवैधानिक संरक्षण



(a) अवैध प्रेरणा-दबाव पर पूर्ण निषेध

धारा 182(1) स्पष्ट करती है कि किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्य प्राधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 22 में वर्णित किसी भी प्रकार का प्रलोभन, धमकी या वादा देकर कथन दिलवाए।
यह उपबंध आरोपी के अनुच्छेद 20(3) के अधिकार—स्वयं को अपराध सिद्ध करने के लिए बाध्य न किया जाना—का विधिक विस्तार है।

(b) स्वेच्छा से कथन देने पर कोई प्रतिबंध नहीं

उप-धारा (2) यह भी सुनिश्चित करती है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को “सावधानी, टोक या निर्देश देकर” स्वेच्छा से दिया जाने वाला कथन देने से न रोके।
यह एक संतुलनकारी प्रावधान है—जहाँ पुलिस के दुव्यवहार पर रोक है, वहीं स्वैच्छिक कथनों के लिए क्षेत्र भी सुरक्षित रखा गया है।


⚖️ धारा 183 : मजिस्ट्रेट द्वारा इकबाल-ए-जुर्म एवं बयान का अभिलेखन



(a) किसे अधिकार है—मजिस्ट्रेट का क्षेत्राधिकार

धारा 183(1) के अनुसार जिले का कोई भी मजिस्ट्रेट, भले ही उस मामले का भौगोलिक अधिकारक्षेत्र उसके पास न हो, अन्वेषण के दौरान या ट्रायल शुरू होने से पहले किसी आरोपी के इकबाल-ए-जुर्म (Confession) अथवा बयान को विधिसम्मत रूप से दर्ज कर सकता है।
यह प्रावधान पुलिस-राज हटाकर न्यायिक पर्यवेक्षण को प्राथमिकता देता है।

(b) बयान का ऑडियो-वीडियो अभिलेखन

पहला प्रावधान यह अनिवार्य करता है कि आरोपी के अधिवक्ता की उपस्थिति में बयान को ऑडियो-वीडियो माध्यम से भी रिकॉर्ड किया जा सकता है—यह पारदर्शिता का आधुनिक उपाय है।

(c) पुलिस-अधिकारी द्वारा स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड करने पर पूर्ण रोक

दूसरा प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस अधिकारी, भले ही उन्हें दंडाधिकारी की शक्तियाँ प्राप्त हों, स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड नहीं कर सकते



⚖️ धारा 183(2) : मजिस्ट्रेट का दायित्व—“स्वतंत्र इच्छा” की जांच



बयान दर्ज करने से पहले मजिस्ट्रेट यह बताता है कि व्यक्ति किसी कथन के लिए बाध्य नहीं है, और यदि वह स्वीकारोक्ति करता है तो वह बाद में साक्ष्य के रूप में उसके खिलाफ उपयोग हो सकता है।
मजिस्ट्रेट तभी स्वीकारोक्ति दर्ज करेगा जब वह पूछताछ करके आश्वस्त हो जाए कि कथन पूरी तरह स्वैच्छिक है।



⚖️ धारा 183(3) : स्वीकारोक्ति से इनकार की स्थिति



यदि आरोपी कह दे कि वह स्वीकारोक्ति नहीं करना चाहता, तो मजिस्ट्रेट उसे पुलिस हिरासत में वापस भेजने से इनकार करेगा।
यह आरोपी को पुलिस-दबाव से बचाने वाला सुरक्षा–उपबंध है।



⚖️ धारा 183(4) : स्वीकारोक्ति के अभिलेखन का विधिक प्रारूप



मजिस्ट्रेट को स्वीकारोक्ति को धारा 316 BNSS के अनुसार लिखित रूप में दर्ज करना होता है तथा नीचे अधिदेश (certificate) देना होता है कि—

  • आरोपी को उसके अधिकार बताए गए,
  • कथन स्वेच्छा से किया गया,
  • मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में पूरा रिकॉर्ड किया गया।

यह प्रमाण एक वैधानिक सुरक्षा-उपबंध है जो ट्रायल में स्वीकारोक्ति की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।



⚖️ धारा 183(5) : अन्य बयान (Non-Confessional Statements)



गैर-स्वीकारोक्ति बयानों को मजिस्ट्रेट वैधानिक साक्ष्य-रिकॉर्डिंग की पद्धति के अनुरूप लिखता है और आवश्यक होने पर शपथ भी दिला सकता है।



⚖️ धारा 183(6) : विशेष रूप से गंभीर अपराधों में पीड़िता/साक्षी के बयान की अनिवार्यता



यह उपधारा धारा 64-79 एवं 124 BNS के अपराधों (यौन-अपराध, मानव-तस्करी, अत्याचार आदि) में—

(a) महिला मजिस्ट्रेट द्वारा बयान का तात्कालिक अभिलेखन

पीड़िता का बयान “जितना संभव हो” महिला मजिस्ट्रेट द्वारा लिया जाए;
यदि उपलब्ध न हो तो पुरुष मजिस्ट्रेट, लेकिन किसी महिला की उपस्थिति में

(b) गंभीर दंड वाले अपराधों में पुलिस द्वारा तुरंत साक्षी को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना

जहाँ दंड 10 वर्ष, आजीवन कारावास या मृत्युदंड हो, वहाँ बयान रिकॉर्ड करना अनिवार्य है।

(c) मानसिक/शारीरिक रूप से विकलांग पीड़िता के लिए विशेष प्रावधान

  • दुभाषिया/विशेष शिक्षक की सहायता अनिवार्य
  • बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से रिकॉर्ड किया जाए
  • ऐसा बयान Examination-in-Chief के स्थान पर मान्य होगा तथा ट्रायल में केवल cross-examination आवश्यक होगी—
    यह अत्यंत पीड़ित-अनुकूल प्रावधान है।

⚖️ धारा 183(7) : आगे की प्रक्रिया



रिकॉर्ड किया गया बयान उस मजिस्ट्रेट को प्रेषित किया जाएगा जिसके समक्ष मामला विचारणीय या विचारणीय होने वाला है।



⚖️ धारा 184 : बलात्कार/प्रयास-बलात्कार के मामलों में चिकित्सीय परीक्षण


(a) 24 घंटे के भीतर चिकित्सा परीक्षण

धारा 184(1) अनिवार्य करती है कि पीड़िता को सूचना प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर सरकार/स्थानीय प्राधिकरण के अस्पताल के पंजीकृत चिकित्सक के पास भेजा जाए।
यह देरी से होने वाली साक्ष्य-क्षति को रोकने के उद्देश्य से है।

(b) चिकित्सीय रिपोर्ट के अनिवार्य तत्व

उपधारा (2) में परीक्षण-रिपोर्ट के घटक विस्तार से निर्धारित हैं—

  • पीड़िता का नाम-पता
  • आयु
  • डीएनए-प्रोफाइल हेतु नमूने
  • चोटों का विवरण
  • मानसिक-स्थिति
  • अन्य प्रासंगिक तथ्य

(c) निष्कर्ष का औचित्य

रिपोर्ट में हर निष्कर्ष का कारण स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक है—
यह न्यायिक मूल्यांकन को वैज्ञानिक आधार देता है।

(d) सहमति की अनिवार्यता

उपधारा (4) यह घोषित करती है कि पीड़िता की स्पष्ट सहमति के बिना कोई परीक्षण वैध नहीं होगा—
यह शारीरिक-स्वायत्तता का वैधानिक संरक्षण है।

(e) सात दिनों के भीतर रिपोर्ट जमा

नियम के अनुसार मेडिकल रिपोर्ट 7 दिनों में अन्वेषण अधिकारी को भेजी जाएगी, जो आगे इसे मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करेगा।



 निष्कर्ष : पारदर्शी अन्वेषण और न्यायिक निरीक्षण की दिशा में एक सुदृढ़ ढांचा

धारा 182 से 184 का समूहीकृत उद्देश्य यह है कि—

  • स्वीकारोक्ति स्वैच्छिक,
  • बयान न्यायिक निरीक्षण में,
  • पीड़िता-साक्षी के अधिकार सुरक्षित,
  • और अन्वेषण प्रक्रिया पारदर्शी व निष्पक्ष बने।

ये प्रावधान BNSS को आधुनिक न्याय-व्यवस्था में विधिक सुरक्षा कवच के रूप में स्थापित करते हैं।