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“विवाह का झूठा वादा” (False Promise to Marry)

 


धारा 69 BNS के अंतर्गत FIR के पश्चात् पुरुषों द्वारा की जाने वाली विधिक त्रुटियाँ

 सामान्य विधिक गलतियों का विश्लेषण , जो धारा 69 BNS के अंतर्गत दर्ज FIR के पश्चात् पुरुषों द्वारा की जाती हैं, तथा जिनके कारण सुदृढ़ प्रतिरक्षा (Defence) भी दुर्बल हो जाती है।

अनेक आरोपी घबराहटवश, अप्रामाणिक सलाह पर निर्भर होकर अथवा भावनात्मक आवेग में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो उनकी विधिक प्रतिरक्षा को स्थायी क्षति पहुँचा देते हैं।



धारा 69 BNS की विधिक स्थिति का संक्षिप्त अवलोकन

गलतियों पर चर्चा से पूर्व विधिक स्पष्टता आवश्यक है—

  • शिकायतकर्ता (Complainant) केवल महिला हो सकती है।
  • अभियुक्त (Accused) केवल पुरुष हो सकता है।
  • असफल संबंध (Failed Relationship) अथवा विवाह से इंकार अपने-आप में अपराध नहीं है।
  • अभियोजन (Prosecution) को यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि प्रारंभ से ही कपटपूर्ण एवं धोखाधड़ीपूर्ण आशय (Dishonest Intention / Mens Rea) विद्यमान था।
  • सहमति (Consent) एवं आचरण (Conduct) निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

इसके बावजूद अनेक निर्दोष पुरुष टाली जा सकने वाली गलतियों के कारण विधिक आधार (Legal Ground) खो देते हैं।


धारा 69 BNS के अंतर्गत FIR के पश्चात् सामान्य विधिक गलतिया

यदि धारा 69 BNS के अंतर्गत “विवाह का झूठा वादा” (False Promise to Marry) के आरोप में FIR दर्ज हुई है, तो भारतीय विधि के अधीन अपने अधिकारों की रक्षा हेतु निम्नलिखित गलतियों से बचना अत्यावश्यक है—


⚖️ त्रुटि 1: यह मान लेना कि “संबंध सहमति से था, अतः कुछ नहीं होगा”


यह सबसे गंभीर त्रुटि है।

अनेक पुरुष यह मान लेते हैं कि चूँकि संबंध सहमति से था, अतः विधि स्वतः उनका संरक्षण करेगी। यह धारणा अत्यंत जोखिमपूर्ण है।


FIR के स्तर पर पुलिस आशय (Intention) की गहन परीक्षा नहीं करती; यह परीक्षण न्यायालय द्वारा किया जाता है।


यदि अभियुक्त यह सोचकर विधिक कार्यवाही में विलंब करता है कि सत्य स्वयं प्रकट हो जाएगा, तो वह गिरफ्तारी, दमनात्मक अन्वेषण (Coercive Investigation) तथा अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के अवसर की हानि का जोखिम उठाता है।


⚖️ त्रुटि 2: तत्काल अग्रिम जमानत हेतु आवेदन न करना


धारा 69 BNS एक गंभीर एवं साधारण प्रकृति का अपराध नहीं है।

अनेक पुरुष पुलिस नोटिस अथवा मौखिक आश्वासन की प्रतीक्षा करते रहते हैं। यह विलंब अभियोजन को रणनीतिक लाभ प्रदान करता है।

अग्रिम जमानत अपराध स्वीकारोक्ति (Admission of Guilt) नहीं है; यह एक संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Protection) है। विलंब अभियुक्त की विश्वसनीयता को क्षीण करता है तथा अभियोजन के कथन को सुदृढ़ करता है।


⚖️ त्रुटि 3: विधिक परामर्श के बिना पुलिस को विस्तृत बयान देना


अनेक अभियुक्त पुलिस के समक्ष “पूरी बात स्पष्ट करने” का प्रयास करते हैं।

अधिकांशतः यह कदम प्रतिकूल सिद्ध होता है।

पुलिस कथन सदैव निष्पक्ष भाषा में अभिलेखित हों, यह सुनिश्चित नहीं है। भावनात्मक स्पष्टीकरण, स्वीकारोक्ति सदृश कथन अथवा संबंध के विवरण बाद में चयनात्मक रूप से अभियुक्त के विरुद्ध प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

अभियुक्त का पक्ष विधिक अधिवक्ता के माध्यम से सुविचारित ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि आवेग में।


⚖️ त्रुटि 4: शिकायतकर्ता से संपर्क या समझौता वार्ता का प्रयास


फोन कॉल, संदेश अथवा प्रत्यक्ष “समझौता” का प्रयास गंभीर विधिक भूल है।

इसके परिणामस्वरूप—

  • दबाव अथवा भयादोहन (Intimidation) के आरोप लग सकते हैं।
  • अतिरिक्त धाराएँ जोड़ी जा सकती हैं।
  • प्रभाव डालने के प्रयास के आधार पर जमानत निरस्त हो सकती है।

सद्भावनापूर्ण संवाद भी विधिक रूप से भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकता है।


⚖️ त्रुटि 5: चैट, फोटो या कॉल रिकॉर्ड हटाना


भय अथवा लज्जा के कारण डिजिटल सामग्री हटाना अत्यंत गंभीर त्रुटि है।

धारा 69 BNS के प्रकरणों में डिजिटल आचरण प्रायः अभियुक्त की सबसे सशक्त प्रतिरक्षा सिद्ध होता है। साक्ष्य हटाने से अभियोजन को प्रतिकूल अनुमान (Adverse Inference) तथा मनगढ़ंत आरोप (Fabrication) का तर्क प्रस्तुत करने का अवसर मिल जाता है।

साक्ष्य का संरक्षण ही विधिक संरक्षण है।


⚖️ त्रुटि 6: यह मान लेना कि FIR का अर्थ स्वतः दोषसिद्धि है


अनेक पुरुष FIR के पश्चात् मानसिक रूप से पराजय स्वीकार कर लेते हैं।

यह भय उन्हें जल्दबाजी में समझौता, बाध्य विवाह अथवा असत्य स्वीकारोक्ति जैसे कदम उठाने हेतु प्रेरित करता है।

वास्तविकता यह है कि “विवाह के झूठे वादे” के प्रकरणों में दोषसिद्धि दर निम्न रहती है, विशेषकर तब जब—

  • संबंध दीर्घकालीन एवं सहमति आधारित हो;
  • प्रारंभिक कपटपूर्ण आशय का कोई प्रमाण न हो;
  • आचरण आरोपों का खंडन करता हो।

भय आधारित निर्णय अन्यथा बचाव योग्य प्रकरण को नष्ट कर देते हैं।


⚖️ त्रुटि 7: अपर्याप्त आधार पर निरस्तीकरण याचिका (Quashing Petition) दायर करना


कुछ अभियुक्त बिना विधिक रणनीति के शीघ्रता में निरस्तीकरण याचिका दायर कर देते हैं।

दुर्बल रूप से प्रारूपित याचिका न्यायालय द्वारा अस्वीकृत होने पर भविष्य की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न कर सकती है।

निरस्तीकरण, विशेषतः अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अथवा दण्ड प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों के अधीन, निम्न बिंदुओं पर सटीक अभिकथन (Precise Pleading) अपेक्षित करता है—

  • प्रारंभिक कपटपूर्ण आशय (Initial Mens Rea) का अभाव
  • आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Criminal Process)
  • विवाद का नागरिक (Civil) स्वरूप

समय एवं प्रारूपण (Drafting) अत्यंत निर्णायक हैं।


⚖️ त्रुटि 8: मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव की उपेक्षा


जब मानसिक संतुलन प्रभावित होता है, तो विधिक प्रतिरक्षा भी दुर्बल हो जाती है।

असत्य आरोपों के आघात को कम आँकना, कार्यक्षमता में गिरावट तथा वाद-प्रक्रिया में असंगति उत्पन्न करता है।

न्यायालय आचरण एवं स्थिरता का अवलोकन करता है। संयम एवं निरंतरता विश्वसनीयता को सुदृढ़ करते हैं।

पेशेवर एवं विधिक सहायता प्राप्त करना दुर्बलता नहीं, बल्कि रणनीति है।


⚖️ निष्कर्ष


धारा 69 BNS एक गंभीर विधिक प्रावधान है, किन्तु इसका उद्देश्य असफल संबंधों को अपराध घोषित करना नहीं है।

अधिकांश पुरुष इसलिए पराजित नहीं होते कि विधि उनके प्रतिकूल है, बल्कि वे प्रारम्भिक चरण में भय, लज्जा अथवा भ्रान्त जानकारी के कारण रणनीतिक त्रुटियाँ कर बैठते हैं।

यदि आप धारा 69 BNS के अंतर्गत FIR का सामना कर रहे हैं—

  • शीघ्र विधिक कदम उठाएँ।
  • विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाएँ।
  • रणनीतिक दृष्टिकोण रखें।

आपकी चुप्पी, घबराहट अथवा आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया आरोप से अधिक गंभीर क्षति पहुँचा सकती है।

प्रत्येक धारा 69 BNS प्रकरण तथ्यों एवं परिस्थितियों पर आधारित होता है। यह लेख केवल विधिक जागरूकता हेतु है; इसे व्यक्तिगत विधिक परामर्श का विकल्प न माना जाए।