“घरेलू अपराधों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य की निर्णायक भूमिका”
"परिस्थितियों की श्रृंखला (chain of circumstances) पूर्ण, अविच्छिन्न तथा अभियुक्त की दोषसिद्धि की ओर ही संकेत करने वाली होनी चाहिए।"
इस प्रकरण में यह तथ्य निर्विवाद रूप से सिद्ध हुआ कि अभियुक्त-पति की दो पत्नियाँ थीं तथा वह मृतका (प्रथम पत्नी) के साथ निरंतर क्रूरता एवं उत्पीड़न करता था। साक्ष्यों से यह भी प्रमाणित हुआ कि अभियुक्त द्वारा मृतका को कई बार जान से मारने की धमकी दी गई थी, जो कि उसके दुष्प्रेरक आशय (motive) को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है।
उक्त प्रकरण में अभियोजन का संपूर्ण मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, जहाँ प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य का अभाव था।
घटना की रात अभियुक्त एवं मृतका दोनों ने साथ-साथ सिनेमा का द्वितीय शो देखा, तत्पश्चात दोनों अपने आवासीय गृह में लौटे और वहीं रात्रि विश्राम किया। अगले प्रातः मृतका को उसी घर में मृत अवस्था में पाया गया। पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतका की मृत्यु का कारण गला दबाकर हत्या (strangulation) था, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मृत्यु हत्या (homicidal death) थी, न कि आकस्मिक अथवा आत्महत्या।
अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि अभियुक्त ने पुलिस को दी गई सूचना में यह उल्लेख नहीं किया कि घटना के समय घर में कोई अन्य व्यक्ति भी उपस्थित था। साथ ही, अभियुक्त द्वारा यह स्पष्ट करने हेतु कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि उसकी पत्नी की हत्या कैसे और किन परिस्थितियों में हुई।
ऐसी स्थिति में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 लागू होती है, जिसके अनुसार वे तथ्य जो विशेष रूप से अभियुक्त के ज्ञान में हों, उनका स्पष्टीकरण देना अभियुक्त का दायित्व होता है। अभियुक्त द्वारा इस दायित्व का निर्वहन न किया जाना अभियोजन की परिस्थितियों की श्रृंखला में एक अतिरिक्त एवं सुदृढ़ कड़ी (additional link) के रूप में माना गया।
अतः न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियाँ पूर्णतः सिद्ध हैं, परस्पर संगत हैं तथा केवल अभियुक्त की दोषसिद्धि की ओर ही संकेत करती हैं। इस प्रकार अभियुक्त की संलिप्तता संदेह से परे (beyond reasonable doubt) सिद्ध हुई और इसलिए अभियुक्त को धारा 302 भा.दं.सं. के अंतर्गत दोषी ठहराया जाना विधिसम्मत एवं न्यायोचित माना गया।

