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पुलिस जांच का वास्तविक दायरा: क्या कहती है धारा 175?

 


पुलिस जांच की वैधता, अधिकार-सीमा और न्यायिक नियंत्रण



वह प्रावधान जो पुलिस को स्वतः संज्ञान लेकर किसी भी संज्ञेय अपराध की जांच करने का अधिकार देता है।
लेकिन साथ ही, इस अधिकार के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-कौन सी वैधानिक सुरक्षा-व्यवस्थाएँ लगाई गई हैं।”


प्रावधान का सार: Section 175 BNSS, 2023

धारा 175 यह स्पष्ट करती है कि—


⚖️ पुलिस स्टेशन प्रभारी का स्वतः जांच का अधिकार


किसी भी पुलिस स्टेशन का Officer-in-Charge बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के किसी भी संज्ञेय अपराध की जांच शुरू कर सकता है,
यदि उस अपराध का परीक्षण उक्त न्यायालय कर सकता है जिसकी स्थानीय क्षेत्राधिकार सीमा वही है।

👉 अर्थात—संज्ञेय अपराध में pre-investigation permission की बाध्यता नहीं है।
यह प्रावधान अपराधों की त्वरित जांच सुनिश्चित करता है, ताकि अपराधी बच न सके और साक्ष्य सुरक्षित रहें।



⚖️ SP का निरीक्षणीय नियंत्रण (Supervisory Control)


प्रोवाइज़ो एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है—

यदि अपराध गंभीर प्रकृति का हो, तो
Superintendent of Police (SP) यह आदेश दे सकता है कि Deputy SP स्तर का अधिकारी जांच करेगा

👉 कानूनी तर्क:

  • गंभीर अपराध में उच्च रैंक का अधिकारी आने से
    जांच की निष्पक्षता, विशेषज्ञता और जवाबदेही बढ़ती है।
  • यह प्रावधान misuse of power को रोकने का एक सुरक्षा कवच है।

⚖️ पुलिस कार्रवाई की वैधता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा (Sub-section 2)


धारा 175(2) यह कहती है कि—
किसी भी चरण में पुलिस जांच को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि
अधिकारी को उस मामले की जांच का अधिकार नहीं था।

👉 उद्देश्य:

  • जांच प्रक्रिया को technical objections से बचाना।
  • ताकि अभियोजन समय पर आगे बढ़ सके और न्यायिक प्रक्रिया बाधित न हो।

⚖️ मजिस्ट्रेट का वैधानिक हस्तक्षेप (Sub-section 3)


धारा 210 के अंतर्गत अधिकार प्राप्त मजिस्ट्रेट—
यदि शिकायतकर्ता हलफनामा दायर करे,
और मजिस्ट्रेट आवश्यक पूछताछ करे,
तो वह पुनः जांच / उचित जांच का आदेश दे सकता है।

👉 कानूनी महत्व:

  • यदि जांच पक्षपातपूर्ण हो या अधूरी हो,
    तो मजिस्ट्रेट न्यायिक नियंत्रण के रूप में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • यह checks and balances की न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करता है।

⚖️ लोक सेवक के विरुद्ध शिकायत पर विशेष सुरक्षा (Sub-section 4)


यदि शिकायत किसी लोक सेवक (Public Servant) के विरुद्ध है
और वह शिकायत उसके कार्यक्षेत्र से उत्पन्न कृत्य को लेकर है—
तो मजिस्ट्रेट तभी जांच का आदेश देगा जब—

(a) उससे वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट प्राप्त हो;
(b) लोक सेवक का पक्ष (assertions) भी विचार किया गया हो।

👉 कानूनी तर्क:

  • प्रशासनिक कार्यवाही के दौरान किए गए कार्यों पर
    कदाचार के आरोप अक्सर राजनीतिक या प्रतिशोधात्मक भी हो सकते हैं।
  • इसलिए लोक सेवक को प्रारंभिक संरक्षण प्रदान करना आवश्यक माना गया है,
    ताकि भय के बिना वह अपने कर्तव्य निभा सके।

⚖️ निष्कर्ष (Editorial Opinion)


धारा 175 BNSS पुलिस को त्वरित कार्रवाई का अधिकार देती है,
लेकिन साथ ही तीन स्तरों पर नियंत्रण का ढांचा भी तैयार करती है—

  1. SP का supervisory control
  2. मजिस्ट्रेट का judicial oversight
  3. लोक सेवक के लिए प्रारंभिक सुरक्षा

इससे कानून की दृष्टि से एक संतुलन बनता है—
न अपराधी बचे, न अधिकारी का अधिकार अनियंत्रित रहे।
यही इस प्रावधान की संवैधानिक और विधिक मंशा है।