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असंज्ञेय अपराध में पुलिस की सीमाएँ: धारा 174 का कानूनी विश्लेषण

 


BNSS धारा 174 — असंज्ञेय (Non-Cognizable) अपराध की सूचना पर पुलिस की कार्यवाही : विस्तृत व्याख्या


⚖️ उपधारा (1): सूचना का लेखा-जोखा और मैजिस्ट्रेट को संदर्भित करना


जब किसी पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को उसके क्षेत्राधिकार में किसी असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offence) के घटित होने की सूचना प्राप्त होती है, तो कानून उस पर दो अनिवार्य कर्तव्य आरोपित करता है—


1. सूचना का लेखन (Entry):

अधिकारी सूचना का सार (substance) उस अभिलेख-पुस्तक (Register) में दर्ज करेगा, जिसे राज्य सरकार नियमों द्वारा निर्धारित प्रारूप में रखे जाने का आदेश देती है।



2. सूचक को मैजिस्ट्रेट के पास भेजना (Reference):

ऐसा अधिकारी सूचनाकर्ता/Informant को सीधे-सीधे सक्षम मैजिस्ट्रेट के समक्ष जाने के लिए संदर्भित करेगा, क्योंकि असंज्ञेय अपराध में पुलिस को स्वतः जाँच का अधिकार नहीं होता।



3. दैनिक डायरी की रिपोर्ट भेजना:

थानेदार को यह भी सुनिश्चित करना है कि ऐसे सभी असंज्ञेय मामलों की दैनिक डायरी (Daily Diary) प्रविष्टियों का संकलन पाक्षिक (Fortnightly) रूप से मैजिस्ट्रेट को प्रेषित किया जाए।




⚖️ उपधारा (2): जाँच पर प्रतिबंध एवं मैजिस्ट्रेट का आदेश


कानून स्पष्ट करता है—


पुलिस अधिकारी बिना सक्षम मैजिस्ट्रेट के आदेश के असंज्ञेय मामले में जाँच नहीं कर सकता।

यह उपधारा असंज्ञेय अपराध में पुलिस की शक्तियों पर स्पष्ट विधिक प्रतिबंध लगाती है।




⚖️ उपधारा (3): आदेश मिलने के बाद जाँच की शक्ति


यदि सक्षम मैजिस्ट्रेट जाँच का आदेश दे देता है, तब—


पुलिस अधिकारी को लगभग वही शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं जो संज्ञेय अपराध की जाँच में मिलती हैं, परंतु—अधिकार सीमित हैं:

👉 पुलिस गिरफ्तारी बिना वारंट (Arrest Without Warrant) नहीं कर सकती।



यह उपधारा जांच-अधिकार का दायरा स्पष्ट रूप से निर्धारित करती है।



⚖️ उपधारा (4): मिश्रित मामलों में विधिक स्थिति


यदि किसी मामले में दो या अधिक अपराध जुड़े हुए हों—


और उनमें से कम से कम एक संज्ञेय (Cognizable) हो, तो पूरा मामला संज्ञेय मामला माना जाएगा, भले ही शेष अपराध असंज्ञेय क्यों न हों। इससे पुलिस को संपूर्ण मामले में पूर्ण जाँच अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।




⚖️ संक्षिप्त कानूनी निष्कर्ष


धारा 174 BNSS का उद्देश्य—


असंज्ञेय अपराधों में पुलिस को सीमित अधिकार देना, जाँच की प्रक्रिया को न्यायिक नियंत्रण (Judicial Control) में रखना, तथा मिश्रित अपराधों में जाँच को बाधित होने से बचाना है।



इस प्रावधान का मूल सिद्धांत यह है कि—

“असंज्ञेय अपराध की जाँच पुलिस स्वतः नहीं कर सकती; न्यायालय की अनुमति अनिवार्य है।”