भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 110, तथा 111 से संबंधित विधिक सिद्धांतों
धारा 110 के अनुसार सामान्य विधिक अनुमान (Presumption) यह है कि यदि कोई व्यक्ति 30 वर्ष के भीतर जीवित था, तो उसे जीवित ही माना जाएगा, जब तक कि उसके मृत होने का प्रमाण प्रस्तुत न किया जाए।
धारा 111 इस नियम का अपवाद (Exception) है। यदि कोई व्यक्ति सात वर्षों तक उन लोगों द्वारा नहीं सुना गया जो सामान्यतः उसके बारे में सुनते, तो न्यायालय यह अनुमान कर सकता है कि वह व्यक्ति मृत हो चुका है।
●✒ किन्तु यह अनुमान केवल मृत्यु के तथ्य (Fact of Death) तक सीमित है।
●✒ इससे यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह व्यक्ति कब मरा।
●✒ न ही यह माना जा सकता है कि वह सात वर्ष पहले ही मर गया था या गायब होने के तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई थी।
यदि किसी वाद में मृत्यु की तिथि या समय (Date or Time of Death) विवाद का विषय हो, तो उसका निर्धारण केवल प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Direct or Circumstantial Evidence) के आधार पर ही किया जा सकता है।
●✒ जो पक्ष यह दावा करता है कि व्यक्ति की मृत्यु किसी विशेष तिथि या समय पर हुई, उस पर ही उस तथ्य को सिद्ध करने का प्रमाण भार (Burden of Proof) रहेगा।
●✒ धारा 111 केवल इतना प्रभाव डालती है कि जब सात वर्षों तक कोई व्यक्ति नहीं सुना गया हो, तब जीवित होने का दावा करने वाले व्यक्ति पर प्रमाण का भार स्थानांतरित हो जाता है।
जिला न्यायाधीश (District Judge) केवल इस आधार पर कि धारा 111 लागू होती है, यह घोषणा (Declaration) नहीं कर सकता कि व्यक्ति किस तिथि को मरा।
धारा 111 के अंतर्गत अधिकतम यह अनुमान लगाया जा सकता है कि—
●✒ व्यक्ति मृत हो चुका है, परन्तु मृत्यु की सटीक तिथि या समय का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
धारा 111 BSA या सामान्य तर्क के आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि—
●✒ व्यक्ति गायब होने की तिथि पर ही मर गया, या
●✒ उसके तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई।
●✒ मृत्यु का वास्तविक समय साक्ष्य से सिद्ध किया जाना आवश्यक है, और उसका भार उस व्यक्ति पर रहेगा जो उस तथ्य का दावा करता है।
●✒ यदि कोई बीमित व्यक्ति सात वर्षों से लापता हो और उसके बारे में कोई सूचना न हो, तो न्यायालय यह मान सकता है कि वह मृत है, परन्तु—
●✒ यह नहीं माना जा सकता कि उसकी मृत्यु गायब होने की तिथि पर ही हुई।
●✒ यदि बीमा पॉलिसी प्रीमियम न देने के कारण समाप्त हो चुकी हो, तो दावेदार को पूरी बीमा राशि नहीं, बल्कि केवल Paid-up value का ही अधिकार मिलेगा।
यदि साक्षियों के बयान से यह सिद्ध हो जाए कि कोई व्यक्ति 35–40 वर्षों से दिखाई या सुना नहीं गया, तो न्यायालय सुरक्षित रूप से यह अनुमान लगा सकता है कि वह व्यक्ति मृत है, और ऐसी स्थिति में धारा 110 और 111 दोनों लागू होंगी।
धारा 110 – कब्जे के आधार पर स्वामित्व का अनुमान
धारा 110 का सिद्धांत यह है कि दीर्घकालिक और शांतिपूर्ण कब्जा (Long, Peaceful and Settled Possession) संपत्ति पर स्वामित्व का प्रथमदृष्टया प्रमाण (Prima Facie Evidence of Title) माना जाता है।
यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से संपत्ति पर काबिज है, तो—
●✒ यह अनुमान लगाया जाएगा कि वही उसका वास्तविक स्वामी (Owner) है।
●✒ इसके विपरीत सिद्ध करने का भार प्रतिवादी पर स्थानांतरित हो जाता है।
यदि वादी ने स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए वाद दायर किया हो और अभिलेखों से यह सिद्ध हो जाए कि—
●✒ वादी का संपत्ति पर लंबे समय से शांतिपूर्ण और स्थायी कब्जा है,
●✒ प्रतिवादी यह सिद्ध नहीं कर पाता कि वह भूमि सरकारी या उसकी स्वयं की है,
●✒ तो न्यायालय कब्जे के आधार पर स्वामित्व का अनुमान वादी के पक्ष में लगाकर प्रतिवादी को वादकारियों को बेदखल करने से रोक सकता है।

