सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 की **धारा 144** "संपत्ति की बहाली" से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा उन मामलों में लागू होती है जहाँ किसी पक्षकार को गलत तरीके से संपत्ति (जमीन, मकान आदि) से वंचित कर दिया गया हो और बाद में अदालत के फैसले से यह साबित हो कि वह उस संपत्ति का हकदार था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्याय के हित में पक्षकार को उसकी संपत्ति वापस मिले और उसे पूर्व स्थिति में लाया जाए। इसे "रेस्टिट्यूशन" (पुनर्स्थापना) का सिद्धांत भी कहा जाता है।
धारा 144 का विस्तृत विवरण**
#### **1. प्रावधान का सार (संक्षेप में)**
धारा 144 के तहत, यदि कोई डिक्री या आदेश (न्यायालय का निर्णय) पारित होने के बाद अपील या अन्य कानूनी प्रक्रिया में बदल दिया जाता है या रद्द हो जाता है, तो प्रभावित पक्षकार उस संपत्ति या लाभ की बहाली के लिए आवेदन कर सकता है जो उसने गलत डिक्री के कारण खोया था। इसमें संपत्ति का कब्जा, उससे प्राप्त लाभ, या अन्य संबंधित अधिकार शामिल हो सकते हैं।
- यदि कोई डिक्री या आदेश बदल दिया जाता है या उलट दिया जाता है, तो जिस पक्षकार को उस डिक्री के कारण नुकसान हुआ, वह अदालत से यह माँग कर सकता है कि उसे उसकी संपत्ति या अधिकार वापस मिलें।
- अदालत उस स्थिति को बहाल करने की कोशिश करेगी जो डिक्री लागू होने से पहले थी।
- इसमें संपत्ति के साथ-साथ उससे मिलने वाला कोई लाभ (जैसे किराया या मुनाफा) और ब्याज भी शामिल हो सकता है, जो अदालत उचित समझे।
3. मुख्य शर्तें
धारा 144 लागू होने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- **पिछली डिक्री का बदलाव या रद्द होना**: यह प्रावधान तभी लागू होता है जब कोई डिक्री या आदेश अपील, पुनरीक्षण, या अन्य कानूनी प्रक्रिया में संशोधित या रद्द हो।
- **संपत्ति का नुकसान**: पक्षकार को उस डिक्री के कारण संपत्ति या अधिकार से वंचित होना चाहिए।
- **आवेदन**: प्रभावित पक्षकार को अदालत में बहाली के लिए आवेदन करना होगा। यह अपने आप लागू नहीं होता।
- **न्याय का सिद्धांत**: बहाली का उद्देश्य पक्षकार को नुकसान से बचाना और न्याय सुनिश्चित करना है।
4. लागू होने का दायरा
- यह धारा केवल अचल संपत्ति (जमीन, मकान आदि) तक सीमित नहीं है, बल्कि चल संपत्ति (जैसे पैसे, सामान) और अन्य अधिकारों पर भी लागू हो सकती है।
- यह उन मामलों में भी लागू होती है जहाँ संपत्ति नीलाम हो गई हो या तीसरे पक्ष को हस्तांतरित कर दी गई हो, बशर्ते वह तीसरा पक्ष डिक्री के परिणाम से प्रभावित हो।
6. उदाहरण
मान लीजिए कि एक व्यक्ति "अ" और "ब" के बीच जमीन के स्वामित्व का विवाद है। निचली अदालत "ब" के पक्ष में डिक्री देती है और "अ" को जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। बाद में, अपील में उच्च न्यायालय यह पाता है कि "अ" ही जमीन का असली मालिक है और "ब" की डिक्री रद्द कर दी जाती है। अब "अ" धारा 144 के तहत आवेदन कर सकता है कि उसे उसकी जमीन वापस मिले और उस दौरान "ब" को जो किराया या लाभ मिला, वह भी उसे दिया जाए।
7. सीमाएँ
- यह धारा स्वत: लागू नहीं होती; इसके लिए पक्षकार को सक्रिय रूप से कदम उठाना पड़ता है।
- यदि संपत्ति किसी तीसरे पक्ष को बेच दी गई हो और वह "सद्भावनापूर्ण खरीदार" (bona fide purchaser) हो, तो बहाली जटिल हो सकती है।
- यह केवल वैधानिक डिक्री के बदलाव पर लागू होती है, न कि पक्षकारों के आपसी समझौते पर।
8. महत्व
धारा 144 का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गलत डिक्री के कारण किसी पक्षकार को स्थायी नुकसान न हो। यह न्याय प्रणाली में विश्वास बनाए रखने और पक्षपात को रोकने में मदद करता है।
### **निष्कर्ष**
धारा 144 जमीन संबंधी विवादों में एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह उन लोगों के लिए राहत का प्रावधान करती है जो गलत फैसले के कारण अपनी संपत्ति खो देते हैं। यदि कोई पक्षकार इस स्थिति में है, तो उसे तुरंत कानूनी सलाह लेनी चाहिए और अदालत में बहाली के लिए आवेदन करना चाहिए।