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"Benefit of Doubt" (संदेह का लाभ) भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत

 



"Benefit of Doubt" (संदेह का लाभ) भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो आरोपी (Accused) के अधिकारों की रक्षा के लिए लागू किया जाता है। 


📌 मुख्य प्रावधान (Relevant Provisions)


1. भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act), 1872

धारा 101-104 / (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023, धारा 104-106 ): अभियोजन (Prosecution) की जिम्मेदारी होती है कि वह Beyond Reasonable Doubt (संदेह से परे) अपराध साबित करे।


यदि अदालत को किसी प्रकार का संदेह रहता है, तो आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया जाता है।



2. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code – CrPC), 1973


धारा 232: यदि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में असफल रहता है, तो न्यायालय आरोपी को दोषमुक्त (Acquittal) कर सकता है।


धारा 313: आरोपी को खुद का बचाव करने का अधिकार मिलता है, और यदि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सबूत पर्याप्त नहीं होते, तो उसे संदेह का लाभ दिया जाता है।




3. भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS), 2023


नए दंड संहिता (BNS) में "Benefit of Doubt" को अलग से परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन न्याय के सिद्धांतों के तहत यह मान्य है।




📌 Benefit of Doubt के महत्वपूर्ण तत्व (Essential Conditions)


✔ अभियोजन पक्ष को अपराध साबित करना होगा – यदि अभियोजन पूरी तरह से यह सिद्ध नहीं कर पाता कि आरोपी ने अपराध किया है, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।

✔ साक्ष्य का अभाव (Lack of Evidence) – यदि अभियोजन पक्ष के सबूत पर्याप्त नहीं हैं या परस्पर विरोधाभासी (Contradictory) हैं।

✔ संदेह का लाभ आरोपी को मिलेगा (Presumption of Innocence) – भारतीय कानून में सिद्धांत है कि "जब तक अपराध सिद्ध न हो, तब तक आरोपी निर्दोष माना जाएगा"।

✔ गवाहों के बयानों में विरोधाभास – यदि गवाहों की गवाही एक-दूसरे से मेल नहीं खाती, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिल सकता है।



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📌 महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले (Key Supreme Court Judgments)


1️⃣ Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra (1984)


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "संदेह से परे प्रमाण" अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है, और यदि संदेह बना रहता है, तो आरोपी को बरी किया जाना चाहिए।



2️⃣ Kali Ram v. State of Himachal Pradesh (1973)


न्यायालय ने कहा कि यदि दो व्याख्याएँ संभव हैं – एक अभियुक्त के पक्ष में और दूसरी विरोध में – तो अदालत को अभियुक्त के पक्ष में फैसला देना चाहिए।



3️⃣ State of U.P. v. Krishna Gopal (1988)


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "Benefit of Doubt" सिर्फ तभी दिया जाएगा जब संदेह गंभीर और तार्किक हो, न कि काल्पनिक।




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📌 क्या Benefit of Doubt का दुरुपयोग हो सकता है?


✔ हाँ, कई बार अपराधियों को पर्याप्त साक्ष्य की कमी के कारण "संदेह का लाभ" मिल जाता है और वे बच जाते हैं।

✔ इसलिए न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि "Benefit of Doubt" सिर्फ उन्हीं मामलों में दिया जाए, जहाँ संदेह तार्किक और मजबूत हो।



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📌 निष्कर्ष (Conclusion)


"संदेह का लाभ" भारतीय न्याय प्रणाली में आरोपी के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।


यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत मान्य है।


यदि अभियोजन पक्ष मामला साबित नहीं कर पाता है, तो आरोपी को निर्दोष माना जाता है और बरी कर दिया जाता है।