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ट्रस्ट (Trust ) से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान

 


भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के मुख्य प्रावधान:


धारा 3: Trust एक ऐसा संबंध है जिसमें कोई व्यक्ति (ट्रस्टी) किसी अन्य व्यक्ति (beneficiary) के लाभ के लिए संपत्ति रखता और प्रबंधित करता है।


धारा 4: ट्रस्ट का उद्देश्य—ट्रस्ट का उद्देश्य कानूनी, नैतिक और लोकहितकारी होना चाहिए।


धारा 6: ट्रस्ट की सृष्टि—किसी भी ट्रस्ट की स्थापना एक लिखित दस्तावेज़ द्वारा की जा सकती है।


धारा 10: ट्रस्टी के अधिकार और कर्तव्य—ट्रस्टी को संपत्ति का उचित प्रबंधन करना चाहिए और beneficiary के हित में कार्य करना चाहिए।


धारा 32: ट्रस्टी की देनदारियां—यदि ट्रस्टी अपने कर्तव्यों का उल्लंघन करता है, तो उसे नुकसान की भरपाई करनी होगी।



धार्मिक और चैरिटेबल ट्रस्ट:


धार्मिक और चैरिटेबल ट्रस्टों को विशेष कानूनों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जैसे—


सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860


चैरिटेबल एंड धार्मिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1920


वक्फ अधिनियम, 1995 (मुस्लिम धर्मार्थ ट्रस्टों के लिए)


हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1951





ट्रस्ट के पदासीन सदस्य और उनकी भूमिकाएँ


1. संस्थापक (Settlor/Author of Trust)


ट्रस्ट की स्थापना करने वाला व्यक्ति या संस्था।


ट्रस्ट की संपत्ति ट्रस्टी को सौंपता है।


ट्रस्ट के उद्देश्यों और शर्तों को निर्धारित करता है।


एक बार ट्रस्ट स्थापित होने के बाद, संस्थापक का ट्रस्ट की दैनिक गतिविधियों में कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता।



2. ट्रस्टी (Trustee)


ट्रस्ट की संपत्ति और उद्देश्यों को निष्पादित करने के लिए नियुक्त व्यक्ति/संस्था।


भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 की धारा 10 के अनुसार, कोई भी सक्षम व्यक्ति ट्रस्टी बन सकता है।


ट्रस्टी को धारा 11 से 30 के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का पालन करना होता है।


संपत्ति का प्रबंधन ट्रस्ट डीड (Trust Deed) के अनुसार किया जाना चाहिए।


ट्रस्टी व्यक्तिगत लाभ के लिए ट्रस्ट की संपत्ति का उपयोग नहीं कर सकता।



3. अध्यक्ष (Chairperson/President)


ट्रस्ट के संचालन में मार्गदर्शक भूमिका निभाता है।


बोर्ड मीटिंग्स की अध्यक्षता करता है।


ट्रस्ट की नीति निर्धारण और प्रमुख निर्णयों में भूमिका होती है।


यह पद आमतौर पर ट्रस्ट डीड के अनुसार होता है।



4. सचिव (Secretary)


ट्रस्ट की प्रशासनिक गतिविधियों को देखता है।


आवश्यक दस्तावेजों को तैयार और संधारित करता है।


ट्रस्टी और अन्य सदस्यों के बीच समन्वय स्थापित करता है।


ट्रस्ट की बैठकें आयोजित करता है और मिनट्स तैयार करता है।



5. कोषाध्यक्ष (Treasurer)


ट्रस्ट की वित्तीय गतिविधियों का प्रबंधन करता है।


चंदे, अनुदान और ट्रस्ट की अन्य आय का रिकॉर्ड रखता है।


बैंक खातों का संचालन और वित्तीय रिपोर्ट तैयार करता है।



6. लाभार्थी (Beneficiary)


वह व्यक्ति या समूह जिसके हित में ट्रस्ट बनाया गया हो।


लाभार्थियों को ट्रस्ट डीड में निर्दिष्ट लाभ प्राप्त होते हैं।


ट्रस्ट के उद्देश्यों के अनुरूप उन्हें शिक्षा, चिकित्सा, वित्तीय सहायता आदि दी जा सकती है।



7. प्रबंधन समिति (Management Committee) (यदि लागू हो)


कुछ ट्रस्टों में एक प्रबंधन समिति बनाई जाती है जो नीतिगत फैसले लेती है।


इसमें अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष और अन्य सदस्य शामिल हो सकते हैं।


यह समिति ट्रस्ट की संपत्ति और उद्देश्यों के अनुसार संचालन सुनिश्चित करती है।



निष्कर्ष

ट्रस्ट के सदस्यों में संस्थापक, ट्रस्टी, अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष और लाभार्थी प्रमुख होते हैं। ट्रस्टी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वह ट्रस्ट की संपत्ति और उद्देश्यों का प्रबंधन करता है। ट्रस्ट डीड के अनुसार, विभिन्न ट्रस्टों में अलग-अलग पदासीन सदस्य हो सकते हैं और उनकी जिम्मेदारियाँ भी भिन्न हो सकती हैं।


ट्रस्ट में लाभार्थी (Beneficiary) कौन होता है?


लाभार्थी (Beneficiary) वह व्यक्ति या समूह होता है, जिसके हित में ट्रस्ट बनाया गया हो और जिसे ट्रस्ट की संपत्ति या उससे प्राप्त लाभों का अधिकार होता है। ट्रस्ट डीड में लाभार्थियों को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया जाता है, और ट्रस्टी का मुख्य कर्तव्य उनके हितों की रक्षा करना होता है।


लाभार्थी के प्रकार


1. निश्चित लाभार्थी (Specific Beneficiary)


ट्रस्ट डीड में जिन व्यक्तियों या संस्थाओं के नाम स्पष्ट रूप से लिखे होते हैं।


उदाहरण: यदि कोई ट्रस्ट गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति देने के लिए बनाया गया है, तो वे छात्र लाभार्थी होंगे।



2. अनिश्चित/संभावित लाभार्थी (Discretionary Beneficiary)


जब ट्रस्ट डीड में लाभार्थियों की सूची निश्चित नहीं होती, बल्कि ट्रस्टी को यह अधिकार होता है कि वह तय करे कि कौन लाभ प्राप्त करेगा।


उदाहरण: यदि किसी चैरिटेबल ट्रस्ट में "आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग" लाभार्थी बताए गए हैं, तो ट्रस्टी यह तय करेगा कि कौन इन मानदंडों को पूरा करता है।



3. सार्वजनिक लाभार्थी (Public Beneficiary)


जब ट्रस्ट का उद्देश्य समाज के एक बड़े वर्ग या संपूर्ण समाज को लाभ पहुँचाना होता है।


उदाहरण: अस्पताल, स्कूल, धार्मिक संस्थान, और अन्य सार्वजनिक कल्याणकारी संस्थान।



4. निजी लाभार्थी (Private Beneficiary)


जब ट्रस्ट विशेष रूप से एक परिवार या कुछ निर्दिष्ट व्यक्तियों के लिए बनाया गया हो।


उदाहरण: कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के लिए ट्रस्ट स्थापित करता है।



लाभार्थियों के अधिकार


1. ट्रस्ट संपत्ति से लाभ प्राप्त करने का अधिकार – यदि ट्रस्ट डीड में लाभार्थी के लिए कोई प्रावधान है, तो उसे उस लाभ को प्राप्त करने का कानूनी अधिकार होता है।



2. ट्रस्टी से उचित प्रबंधन की अपेक्षा – ट्रस्टी को लाभार्थियों के हित में संपत्ति का प्रबंधन करना होता है।



3. जानकारी और पारदर्शिता का अधिकार – लाभार्थी ट्रस्ट की संपत्ति और वित्तीय स्थिति की जानकारी मांग सकता है।



4. अदालत में अपील करने का अधिकार – यदि ट्रस्टी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता या अनुचित तरीके से कार्य करता है, तो लाभार्थी न्यायालय में अपील कर सकता है।




निष्कर्ष

लाभार्थी ट्रस्ट का सबसे महत्वपूर्ण हितधारक होता है, जिसके लिए ट्रस्ट बनाया जाता है। लाभार्थी एक व्यक्ति, समूह, समुदाय या संपूर्ण समाज हो सकता है। ट्रस्टी को कानूनी रूप से लाभार्थियों के हित में कार्य करना आवश्यक होता है, और उनके पास कानूनी अधिकार होते हैं जिससे वे ट्रस्ट के सुचारू संचालन को सुनिश्चित कर सकते हैं।


ट्रस्ट से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Landmark Judgments)




1. Trustees of the Charity Commissioners v. Bombay Municipal Corporation (1975)


मुख्य निष्कर्ष:

चैरिटेबल ट्रस्ट की संपत्ति सार्वजनिक हित में होती है और इसे निजी स्वामित्व के रूप में नहीं माना जा सकता।






2. Smt. Kasturi Devi v. Dy. Director of Consolidation (1976)

मुख्य निष्कर्ष:


ट्रस्ट के तहत संपत्ति को ट्रस्टी व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग नहीं कर सकता।






3. Radhasoami Satsang v. Commissioner of Income Tax (1992)

मुख्य निष्कर्ष:


धार्मिक ट्रस्टों को कर छूट तभी मिलेगी जब उनका उद्देश्य पूर्णतः धर्मार्थ हो।






4. Commissioner of Income Tax v. Surat Art Silk Cloth Manufacturers Association (1980)

मुख्य निष्कर्ष:


यदि ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य समाज की भलाई है और व्यावसायिक गतिविधियाँ केवल सहायक हैं, तो इसे कर छूट मिल सकती है।






5. State of Uttar Pradesh v. Bansi Dhar (1974)

मुख्य निष्कर्ष:


ट्रस्ट की संपत्ति को ट्रस्टी द्वारा अनुचित तरीके से बेचा नहीं जा सकता।




ट्रस्ट कानून के तहत संपत्ति का प्रबंधन और ट्रस्टी के कर्तव्यों को भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 और अन्य संबंधित विधानों के तहत नियंत्रित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई निर्णयों ने ट्रस्ट से जुड़े विवादों में न्यायिक व्याख्या प्रदान की है, जिससे ट्रस्टों की कार्यप्रणाली को स्पष्ट किया गया है।



ट्रस्ट में एक ही परिवार के सभी लोग सदस्य (ट्रस्टी) हो सकते हैं, लेकिन इसके कुछ कानूनी और व्यावहारिक पहलू हैं जिन्हें ध्यान में रखना आवश्यक है।


1. निजी (Private) ट्रस्ट में:


भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत, कोई भी व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के लाभ के लिए एक निजी ट्रस्ट बना सकता है।


इसमें ट्रस्टी, लाभार्थी और अन्य पदाधिकारी परिवार के सदस्य हो सकते हैं।


शर्त: ट्रस्ट को ट्रस्ट डीड में निर्दिष्ट उद्देश्यों के अनुसार संचालित करना होगा और संपत्ति का व्यक्तिगत लाभ के लिए दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।



2. सार्वजनिक (Public) ट्रस्ट में:


सार्वजनिक ट्रस्ट का उद्देश्य समाज के किसी विशेष वर्ग या संपूर्ण जनता के लिए होता है।


यदि किसी ट्रस्ट में केवल एक ही परिवार के सदस्य ट्रस्टी हैं, तो कर विभाग या पंजीकरण प्राधिकारी इसे "पब्लिक ट्रस्ट" के बजाय "प्राइवेट ट्रस्ट" मान सकता है।


धार्मिक या चैरिटेबल ट्रस्टों में परिवार के लोग ट्रस्टी बन सकते हैं, लेकिन आमतौर पर बाहरी व्यक्ति भी शामिल किए जाते हैं ताकि पारदर्शिता बनी रहे।



3. कर और कानूनी प्रभाव:


यदि सभी ट्रस्टी एक ही परिवार के हैं, तो आयकर अधिनियम, 1961 के तहत ट्रस्ट को कर लाभ (धारा 12A और 80G) मिलने में कठिनाई हो सकती है।


यदि यह स्पष्ट हो जाए कि ट्रस्ट का संचालन केवल परिवार के लाभ के लिए किया जा रहा है, तो इसे कर-मुक्त दायरे से बाहर किया जा सकता है।



4. व्यावहारिक विचार:


पारिवारिक ट्रस्टों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए बाहरी ट्रस्टी रखना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।


ट्रस्ट में बाहरी व्यक्ति (गैर-परिवार सदस्य) को शामिल करने से हितों के टकराव (Conflict of Interest) की संभावना कम होती है।