UGC यूजीसी नियम 2026: समानता या नई असमानता?
यूजीसी नियम 2026: समानता या नई असमानता? —
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए “उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026” का उद्देश्य प्रथम दृष्टया जातीय भेदभाव की समाप्ति बताया गया है, किंतु इसके प्रवर्तन के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में, विशेष रूप से सवर्ण समाज द्वारा, तीव्र विरोध प्रारंभ हो गया है। यह विवाद अब केवल सामाजिक न रहकर संवैधानिक वैधता, प्रशासनिक विवेक और संस्थागत संतुलन का प्रश्न बन चुका है।
1. विरोध का मूल कारण: जातीय भेदभाव की परिभाषा का विस्तार
यूजीसी नियम 2026 के अंतर्गत अब ओबीसी वर्ग को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में सम्मिलित कर दिया गया है। परिणामस्वरूप एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी छात्र, शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी भी भेदभाव व उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकते हैं।
सवर्ण समाज का तर्क है कि यह विस्तार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और योग्यता आधारित शैक्षणिक व्यवस्था के संतुलन को प्रभावित करता है, क्योंकि पहले से संरक्षित वर्गों को अतिरिक्त विधिक हथियार प्रदान किए जा रहे हैं।
2. नए कोषांग और समितियाँ: निगरानी या नियंत्रण?
नियमों के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ तथा विश्वविद्यालय स्तर पर समानता समिति के गठन का प्रावधान किया गया है।
इन समितियों में एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना है तथा हर छह माह में यूजीसी को रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था संस्थागत स्वायत्तता (Institutional Autonomy) पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है और विश्वविद्यालयों को निरंतर प्रशासनिक निगरानी के अधीन कर देती है, जो उच्च शिक्षा के स्वतंत्र वातावरण के विपरीत है।
3. सवर्ण समाज की आपत्ति: दुरुपयोग की आशंका
सवर्ण समाज के संगठनों का स्पष्ट आरोप है कि यह कानून एकपक्षीय शिकायत तंत्र स्थापित करता है, जिसमें आरोपित पक्ष को पहले ही रक्षात्मक स्थिति में डाल दिया जाता है।
उनका कहना है कि—
- शिकायत का दायरा अत्यधिक व्यापक है
- प्रथम दृष्टया सत्यापन की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है
- नियमों का दुरुपयोग (misuse) कर व्यक्तिगत या वैचारिक द्वेष निकाला जा सकता है
इसे सवर्ण वर्ग को अलग-थलग करने की नीतिगत साजिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
4. यति नरसिंहानंद का विरोध: प्रतिनिधित्व का प्रश्न
डासना देवी मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि द्वारा उठाया गया प्रश्न इस विवाद को और तीखा करता है। उनका तर्क है कि—जब हर वर्ग के लिए संरक्षण की व्यवस्था हो रही है, तो सवर्ण समाज के लिए कोई पृथक शिकायत तंत्र क्यों नहीं?
उनके अनुसार यदि ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार जैसे वर्गों के साथ अन्याय होता है, तो उनके लिए कौन सा मंच उपलब्ध होगा—यह प्रश्न नियमों में अनुत्तरित है।
उनका दावा है कि इस प्रकार के कानून शैक्षणिक परिसरों के सौहार्दपूर्ण वातावरण को प्रभावित करेंगे।
5. कानून वापसी की चर्चा: राजनीतिक और नीतिगत दबाव
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे चुनावी राज्यों में विरोध की तीव्रता को देखते हुए अब यूजीसी स्तर पर इस नियम पर पुनर्विचार की चर्चाएं प्रारंभ हो गई हैं।
यह माना जा रहा है कि—
- सरकार युवा वर्ग और सामाजिक असंतोष को और नहीं बढ़ाना चाहती
- नियमों की संवैधानिक समीक्षा (constitutional scrutiny) आवश्यक हो गई है
इसी कारण इस कानून को स्थगित या वापस लिए जाने की संभावनाएं प्रबल होती जा रही हैं।
यूजीसी नियम 2026 का उद्देश्य भले ही समानता हो, किंतु उसके क्रियान्वयन से यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि—क्या समानता का अर्थ सभी के लिए समान नियम है, या कुछ वर्गों के लिए विशेष संरक्षण?
जब तक यह नियम संतुलन, निष्पक्षता और संस्थागत स्वायत्तता के सिद्धांतों के अनुरूप संशोधित नहीं किए जाते, तब तक यह विवाद केवल सामाजिक नहीं बल्कि संवैधानिक और विधिक संघर्ष के रूप में बना रहेगा।

